Read the complete Hanuman Bahuk with Hindi word meanings and easy explanations below.
हनुमान बाहुक हिंदी अर्थ सहित – संपूर्ण पाठ, शब्दार्थ और भावार्थ
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदासजी की श्री हनुमानजी को समर्पित अत्यंत भावपूर्ण रचना है। इसमें हनुमानजी के अद्भुत पराक्रम, श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा, भक्तों पर उनकी कृपा और पीड़ा से व्याकुल भक्त की हृदयस्पर्शी प्रार्थना का सुंदर संगम दिखाई देता है।
Hanuman Bahuk in Hindi with Meaning
इस पृष्ठ पर हनुमान बाहुक के सभी 44 छंद दिए गए हैं। प्रत्येक छंद पर क्लिक या टैप करने पर उसके प्रमुख शब्दों का सरल हिंदी अर्थ और पूरी पंक्ति का भावार्थ पढ़ा जा सकता है।
हनुमान बाहुक की मूल भाषा ब्रज है। इसलिए मूल पाठ को यथासंभव उसी रूप में रखा गया है, जबकि उसका अर्थ सरल हिंदी में समझाया गया है। कुछ प्राचीन ब्रज शब्दों का एक शब्द में सीधा अर्थ करना संभव नहीं होता, इसलिए आवश्यकता के अनुसार पूरे पद या शब्द-समूह का अर्थ दिया गया है।
हनुमान बाहुक का पाठ परंपरागत रूप से दुःख, संकट और शारीरिक पीड़ा के समय भक्ति के साथ किया जाता है। यहाँ दिया गया अर्थ धार्मिक और साहित्यिक समझ के लिए है; इसे चिकित्सकीय सलाह या उपचार का विकल्प न मानें।
हनुमान बाहुक कैसे पढ़ें?
नीचे प्रत्येक छंद अलग-अलग खुलने वाले भाग में दिया गया है। जिस छंद का अर्थ पढ़ना हो, उस पर क्लिक करें। खुलने के बाद उसी छंद की पंक्तियों का शब्दार्थ और सरल भावार्थ दिखाई देगा।
संपूर्ण हनुमान बाहुक – 44 छंद हिंदी अर्थ सहित
छंद 1 · छप्पय
सिंधु-तरण, सिय-सोच-हरण, रवि-बाल-बरन तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल, कालहु को काल जनु।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव।
कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक-हित संतत निकट।
गुन गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-संकट-बिकट॥1॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सिंधु = समुद्र; तरण = पार करने वाले; सिय = सीताजी; सोच = शोक; हरण = दूर करने वाले; रवि-बाल-बरन = उगते सूर्य के समान वर्ण; तनु = शरीर।
भावार्थ: हनुमानजी समुद्र पार करने वाले, सीताजी का शोक हरने वाले और उगते सूर्य के समान तेजस्वी शरीर वाले हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: भुज = भुजाएँ; बिसाल = विशाल; मूरति = स्वरूप; कराल = प्रचंड; कालहु को काल = काल के भी काल; जनु = मानो।
भावार्थ: उनकी भुजाएँ विशाल और युद्धरूप अत्यंत प्रचंड हैं। शत्रुओं के लिए वे मानो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: गहन = दुर्गम; दहन = जलाना; लंक = लंका; निःसंक = निर्भय; बंक-भुव = प्रचंड भौंहों वाले।
भावार्थ: दुर्गम लंका में निर्भय होकर प्रवेश करने और उसे अग्नि में जला देने वाला उनका पराक्रम अद्वितीय है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: जातुधान = राक्षस; बलवान = शक्तिशाली; मान-मद = अभिमान और घमंड; दवन = दमन करने वाले; पवनसुव = पवनपुत्र।
भावार्थ: पवनपुत्र हनुमान शक्तिशाली राक्षसों के बल, घमंड और अभिमान का नाश करने वाले हैं।
पंक्ति 5 – शब्दार्थ: सेवत = सेवा करने पर; सुलभ = सहज प्रसन्न होने वाले; सेवक-हित = भक्त का कल्याण; संतत = सदैव; निकट = पास।
भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं कि हनुमानजी सच्ची सेवा से सहज प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के कल्याण के लिए सदा निकट रहते हैं।
पंक्ति 6 – शब्दार्थ: गुन गनत = गुणों का गान करते हुए; नमत = प्रणाम करते हुए; सुमिरत = स्मरण करते हुए; जपत = जप करते हुए; समन = शांत करने वाले; सकल संकट = सभी संकट।
भावार्थ: हनुमानजी के गुण गाने, उन्हें प्रणाम करने, उनका स्मरण और नामजप करने से कठिन संकट भी शांत होने लगते हैं।
छंद 2 · छप्पय
स्वर्ण-सैल-संकास कोटि-रवि-तरुन-तेज-घन।
उर बिसाल, भुज-दंड चंड, नख बज्र, बज्रतन।
पिंग नयन, भृकुटि कराल, रसना दसनानन।
कपिस केस, करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन।
कह तुलसीदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट॥2॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: स्वर्ण-सैल = सोने का पर्वत; संकास = समान; कोटि-रवि = करोड़ों सूर्य; तरुन-तेज = उगते सूर्य का तेज; घन = घना रूप।
भावार्थ: हनुमानजी का स्वरूप स्वर्ण पर्वत के समान विशाल और करोड़ों उगते सूर्यों के संयुक्त तेज जैसा चमकदार है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: उर = वक्षस्थल; बिसाल = विशाल; भुज-दंड = भुजाएँ; चंड = प्रचंड; नख = नाखून; बज्रतन = वज्र जैसा शरीर।
भावार्थ: उनका वक्ष विशाल, भुजाएँ बलवान और शरीर वज्र के समान कठोर तथा शक्तिशाली है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: पिंग नयन = पीताभ तेज वाले नेत्र; भृकुटि = भौंहें; कराल = भयंकर; रसना = जीभ; दसन = दाँत; आनन = मुख।
भावार्थ: युद्ध के समय उनकी तेजस्वी दृष्टि, तनी भौंहें और प्रचंड मुखमुद्रा शत्रुओं में भय उत्पन्न करती है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: केस = बाल; करकस = कठोर; लंगूर = पूँछ; खल-दल = दुष्टों की सेना; बल = शक्ति; भानन = नष्ट करने वाला।
भावार्थ: उनका पूरा वीर रूप दुष्ट सेनाओं के बल को नष्ट कर देने वाला है।
पंक्ति 5-6 – शब्दार्थ: जासु उर = जिसके हृदय में; मारुतसुत = पवनपुत्र; बिकट मूरति = प्रचंड स्वरूप; संताप = दुःख; पाप = पाप; सपनेहुँ = स्वप्न में भी; निकट = पास।
भावार्थ: जिसके हृदय में हनुमानजी का यह महाबली स्वरूप बसता है, उसके निकट पाप और संताप स्वप्न में भी सहज नहीं आ पाते।
छंद 3 · झूलना
पंचमुख-छहमुख-भृगुमुख्य भट-असुर-सुर, सर्व-सरी-समर समरथ सूरो।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो।
दुवन-दल-दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रूरो॥3॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: पंचमुख = पंचमुख शिव; छहमुख = षण्मुख कार्तिकेय; भृगुमुख्य = परशुराम; भट = योद्धा; असुर = दानव; सुर = देव; समर = युद्ध; समरथ = समर्थ।
भावार्थ: हनुमानजी ऐसे महान वीर हैं कि देव, दानव और बड़े-बड़े योद्धाओं के बीच भी उनका पराक्रम अलग चमकता है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बांकुरो = वीर और सुंदर; बीर = योद्धा; बिरुदावली = यशगाथा; बेद = वेद; बंदी = स्तुति करने वाला; पैजपूरो = प्रतिज्ञा पूरी करने वाला।
भावार्थ: उनकी वीरता ऐसी है कि वेद भी मानो उनकी यशगाथा गाते हैं और उन्हें प्रतिज्ञा निभाने वाला महावीर बताते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: गुनगाथ = गुणगाथा; रघुनाथ = श्रीराम; जासुबल = जिनके बल से; बिपुल जल = अपार जल; जग-जलधि = संसार रूपी अथवा वास्तविक सागर।
भावार्थ: स्वयं श्रीराम उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं और उनके बल के सामने विशाल समुद्र भी बाधा न बन सका।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: दुवन-दल = दुष्टों की सेना; दमन = दमन करने वाला; पवन को पूत = पवनपुत्र; रजपूत रूरो = श्रेष्ठ योद्धा।
भावार्थ: तुलसीदास पूछते हैं—दुष्टों का नाश करने के लिए पवनपुत्र हनुमान जैसा महान योद्धा और कौन हो सकता है?
छंद 4 · घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गए, भानु मन-अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।
बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥4॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: भानु = सूर्य; पढ़न = पढ़ने; हनुमान गए = हनुमान गए; सिसुकेलि = बालक की लीला; फेरफार = अद्भुत घटना।
भावार्थ: बाल हनुमान सूर्यदेव के पास शिक्षा प्राप्त करने गए और उनकी यह बाललीला भी अद्भुत पराक्रम का रूप बन गई।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: पाछिले पगनि = पीछे की ओर चलते हुए; गगन = आकाश; मगन-मन = एकाग्र मन; क्रम को न भ्रम = पाठक्रम में भूल नहीं।
भावार्थ: चलते हुए सूर्य की ओर मुख बनाए रखने के लिए हनुमान आकाश में पीछे की ओर बढ़ते रहे, फिर भी उनकी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आई।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: कौतुक = आश्चर्य; लोकपाल = देवगण; हरि = विष्णु; हर = शिव; बिधि = ब्रह्मा; चकाचौंधी = अत्यंत आश्चर्यचकित।
भावार्थ: इस असाधारण दृश्य को देखकर देवता तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक चकित हो गए।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बल = शक्ति; बीररस = वीरता; धीरज = धैर्य; साहस = हिम्मत; सबनिको सार = सबका सार।
भावार्थ: तुलसीदास को लगता है मानो बल, वीरता, धैर्य और साहस—इन सबने मिलकर हनुमानजी का रूप धारण किया हो।
छंद 5 · घनाक्षरी
भारत में पारथ के रथ केतू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हलबल भो।
कह्यो द्रोण भीषम समीरसुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो।
बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि, फलंग फलांगहूंतें घाटि नभतल भो।
नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो॥5॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: भारत = महाभारत युद्ध; पारथ = अर्जुन; रथ केतू = रथ की ध्वजा; कपिराज = हनुमान; गाज्यो = गर्जना की; कुरुराज दल = कौरव सेना।
भावार्थ: महाभारत में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमानजी की गर्जना सुनकर कौरव सेना में भारी हलचल मच गई।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: द्रोण = द्रोणाचार्य; भीषम = भीष्म; समीरसुत = पवनपुत्र; महाबीर = महावीर; बीर-रस-बारि-निधि = वीरता का समुद्र।
भावार्थ: द्रोण और भीष्म जैसे महान योद्धा भी पवनपुत्र को वीरता और शक्ति का विशाल सागर मानते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बालकेलि = बाललीला; भूमि = धरती; भानु = सूर्य; फलंग = छलाँग; नभतल = आकाश।
भावार्थ: बाल्यावस्था में सूर्य को फल मानकर उनकी ओर छलाँग लगाने वाले हनुमान के लिए आकाश की विशालता भी छोटी पड़ गई।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: नाइ माथ = सिर झुकाकर; जोरि हाथ = हाथ जोड़कर; जोधा = योद्धा; जगजीवन को फल = जीवन का महान फल।
भावार्थ: बड़े-बड़े योद्धा भी हाथ जोड़कर हनुमानजी को नमन करते हैं और उनके दर्शन को जीवन का बड़ा सौभाग्य मानते हैं।
छंद 6 · घनाक्षरी
गोपद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो।
द्रोण-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपिखेल बेल कैसो फल भो।
संकट-समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग-पूगनिको करतल पल भो।
साहसी समथ तुलसीको नाह जाकी बांह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो॥6॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: गोपद = गाय के खुर का छोटा गड्ढा; पयोधि = समुद्र; होलिका ज्यों = होली के समान; लंक = लंका; निसंक = निर्भय।
भावार्थ: हनुमानजी ने समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे जितना छोटा समझकर पार किया और लंका को निर्भय होकर जला दिया।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: द्रोण-सो पहार = द्रोण पर्वत; उखारि = उखाड़ लिया; कंदुक-ज्यों = गेंद की तरह; कपिखेल = वानर की खेल-लीला।
भावार्थ: विशाल पर्वत उखाड़ लेना भी उनके लिए मानो गेंद उठाने जैसा सरल खेल था।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: संकट-समाज = अनेक संकट; रामराज काज = श्रीराम का कार्य; जुग-पूगनिको = युगों जितना कार्य; करतल पल = हथेली पर क्षणभर।
भावार्थ: श्रीराम के कार्य में जो काम युगों जितने कठिन लगते थे, हनुमान उन्हें पलभर में पूरा कर देते थे।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: साहसी = साहसी; समथ = समर्थ; तुलसीको नाह = तुलसी के स्वामी; बांह = भुजा; लोकपाल = देव रक्षक।
भावार्थ: तुलसीदास हनुमानजी की शक्तिशाली भुजा को अपने और संसार के लिए अटल रक्षा-आधार मानते हैं।
छंद 7 · घनाक्षरी
कमठकी पीठि जाके गोड़निके गाड़ैं मानो, नापके भाजन भरि जलनिधि-जल भो।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन-बास तिमि तोमनिको थल भो।
कुंभकरन-रावन-पयोधनाद-ईंधनको, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान-सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो॥7॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: कमठकी पीठि = कच्छप की पीठ; गोड़निके गाड़ैं = पैरों के गहरे निशान; जलनिधि = समुद्र।
भावार्थ: यहाँ कवि विशाल उपमाओं द्वारा हनुमानजी के अप्रतिम बल और विराट रूप का वर्णन करते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: जातुधान = राक्षस; दावन = दमन करने वाले; परावन = भागने वाले; दुर्ग = शरणस्थान; महामीन = विशाल मछलियाँ।
भावार्थ: उनकी शक्ति के सामने राक्षसों के लिए बच निकलना कठिन हो जाता है; वर्णन को ब्रह्मांडीय रूप दिया गया है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: कुंभकरन = कुंभकर्ण; रावन = रावण; पयोधनाद = मेघनाद; ईंधन = ईंधन; प्रताप = पराक्रम; प्रबल अनल = प्रचंड अग्नि।
भावार्थ: कुंभकर्ण, रावण और मेघनाद जैसे महाबली शत्रु भी हनुमान के पराक्रमरूपी अग्नि के लिए ईंधन समान हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: त्रिकाल = भूत, वर्तमान और भविष्य; त्रिलोक = तीनों लोक; महाबल = महाशक्तिशाली।
भावार्थ: कवि भाव व्यक्त करते हैं कि तीनों काल और तीनों लोक में हनुमान जैसा महाबली मिलना कठिन है।
छंद 8 · घनाक्षरी
दूत रामरायको, सपूत पूत पौनको, तू अंजनीको नंदन प्रताप भूरि भानु सो।
सीय-सोच-समन, दुरित-दोष-दमन, सरन आए अवन, लखनप्रिय प्रान सो।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबेको भयो, प्रगट तिलोक ओक तुलसी निधान सो।
ज्ञान-गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो॥8॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: दूत रामरायको = श्रीराम के दूत; पूत पौनको = पवनपुत्र; अंजनीको नंदन = अंजनी के पुत्र; प्रताप = तेज; भानु = सूर्य।
भावार्थ: हनुमान श्रीराम के दूत, पवनदेव के पुत्र और माता अंजनी के प्रिय पुत्र हैं; उनका तेज सूर्य के समान प्रखर है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: सीय-सोच-समन = सीताजी का शोक शांत करने वाले; दुरित-दोष-दमन = पाप-दोष मिटाने वाले; सरन आए अवन = शरणागत की रक्षा; लखनप्रिय = लक्ष्मण के प्रिय।
भावार्थ: वे सीताजी को आशा देने वाले, पापों का नाश करने वाले और शरण में आने वाले भक्तों के रक्षक हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: दसमुख = रावण; दुसह दरिद्र = असह्य दुर्भाग्य; दरिबेको = मिटाने के लिए; तिलोक = तीनों लोक; निधान = खजाना।
भावार्थ: रावण जैसे भयंकर दुर्भाग्य का नाश करने के लिए हनुमान तीनों लोकों में दिव्य संपदा के समान प्रकट हुए।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: ज्ञान-गुनवान = ज्ञान और गुणों से भरपूर; बलवान = शक्तिशाली; सेवा सावधान = सेवा में पूरी तरह सजग; उर आनु = हृदय में धारण करो।
भावार्थ: हे मन! ज्ञान, गुण, बल और आदर्श सेवाभाव से पूर्ण हनुमानजी को अपने हृदय में बसाओ।
छंद 9 · घनाक्षरी
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को।
लोक-परलोकतें बिसोक सपने न सोक, तुलसीके हिए है भरोसो एक ओरको।
रामको दुलारो दास बामदेवको निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोरको॥9॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: दवन = नाश करने वाले; दुवन-दल = दुष्टों की सेना; भुवन-बिदित = संसार में प्रसिद्ध; बेद = वेद; बंदीछोर = बंधन छुड़ाने वाले।
भावार्थ: दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले हनुमानजी का बल समस्त जगत में प्रसिद्ध है और शास्त्र उनकी महिमा गाते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: पाप-ताप = पाप और संताप; तिमिर = अंधकार; तुहिन = हिम; सेवक-सरोरुह = भक्तरूपी कमल; भानु भोर = सुबह का सूर्य।
भावार्थ: हनुमान प्रातःकालीन सूर्य की तरह पाप और दुःख का अंधकार मिटाकर भक्तों के हृदय-कमल को खिलाते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: लोक-परलोक = इस लोक और परलोक; बिसोक = शोक रहित; हिए = हृदय; भरोसो = भरोसा; एक ओर = एकमात्र आश्रय।
भावार्थ: तुलसीदास का विश्वास केवल हनुमान में है और उसी आश्रय में उन्हें लोक-परलोक का भय मिटता दिखाई देता है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: रामको दुलारो दास = श्रीराम के प्रिय सेवक; बामदेव = शिव; कलि-कामतरु = कलियुग का कल्पवृक्ष; केसरी-किसोर = केसरीनंदन।
भावार्थ: श्रीराम के प्रिय सेवक केसरीनंदन हनुमान का नाम कलियुग में भक्तों के लिए कल्पवृक्ष समान माना गया है।
छंद 10 · घनाक्षरी
महाबल-सीम, महाभीम, महाबानइत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को।
कुलिस-कठोरतनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धार्मिक धीरको।
दुर्जनको कालसो कराल, पाल सज्जनको, सुमिरे हरनहार तुलसीकी पीरको।
सीय-सुखदायक दुलारो रघुनायकको, सेवक सहायक है साहसी समीर को॥10॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: महाबल-सीम = महाबल की सीमा; महाभीम = अत्यंत प्रचंड; महाबीर = महावीर; रघुबीर = श्रीराम।
भावार्थ: हनुमान बल और शौर्य की पराकाष्ठा हैं और श्रीराम द्वारा स्वीकारे गए महावीर के रूप में प्रसिद्ध हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: कुलिस = वज्र; कठोरतनु = वज्र जैसा शरीर; रन = युद्ध; करुना-कलित = करुणा से भरा; धार्मिक = धर्मनिष्ठ; धीर = धैर्यवान।
भावार्थ: युद्ध में उनका शरीर वज्र के समान प्रचंड है, लेकिन भीतर से वे करुणामय, धर्मनिष्ठ और धीर हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: दुर्जनको काल = दुष्टों के लिए काल; पाल सज्जनको = सज्जनों के रक्षक; सुमिरे = स्मरण करने पर; पीर = पीड़ा।
भावार्थ: दुष्टों के लिए भयंकर और सज्जनों के रक्षक हनुमान को तुलसी अपनी पीड़ा हरने वाले के रूप में स्मरण करते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: सीय-सुखदायक = सीताजी को सुख देने वाले; रघुनायकको दुलारो = श्रीराम के प्रिय; सेवक सहायक = भक्तों के सहायक; समीर = पवनपुत्र।
भावार्थ: सीताजी को आशा देने वाले और श्रीराम को अति प्रिय पवनपुत्र अपने भक्तों के सदा सहायक हैं।
छंद 11 · घनाक्षरी
रचिबेको बिधि जैसे, पालिबेको हरि, हर मीच मारिबेको, ज्याइबेको सुधापान भो।
धरिबेको धरनि, तरनि तम दलिबेको, सोखिबे कृसानु, पोषिबेको हिम-भानु भो।
खल-दुख-दोषिबेको, जन-परितोषिबेको, मांगिबो मलीनताको मोदक सुदान भो।
आरतकी आरति निवारिबेको तिहूं पुर, तुलसीको साहेब हठीलो हनुमान भो॥11॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: बिधि = ब्रह्मा; हरि = विष्णु; हर = शिव; मीच = मृत्यु; सुधापान = अमृत।
भावार्थ: कवि हनुमान के गुणों की तुलना सृष्टि में ब्रह्मा, पालन में विष्णु, विनाश में शिव और जीवन देने में अमृत से करते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: धरनि = धरती; तरनि = सूर्य; तम = अंधकार; कृसानु = अग्नि; हिम-भानु = चंद्रमा।
भावार्थ: वे सहारा देने वाली धरती, अंधकार मिटाने वाले सूर्य, बाधा सुखाने वाली अग्नि और शीतलता देने वाले चंद्रमा जैसे हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: खल = दुष्ट; जन-परितोषिबेको = भक्तों को संतुष्ट करने वाले; मोदक = मिठाई; सुदान = उत्तम दान।
भावार्थ: हनुमान दुष्टों का दमन करते हैं और भक्तों को संतोष, कृपा और कल्याण देते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: आरत = पीड़ित; आरति = कष्ट; निवारिबेको = दूर करने वाले; तिहूं पुर = तीनों लोक; हठीलो = दृढ़।
भावार्थ: तीनों लोकों के पीड़ितों की पीड़ा हरने वाले दृढ़ महावीर हनुमान को तुलसी अपना स्वामी मानते हैं।
छंद 12 · घनाक्षरी
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नांकको।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा रांकको।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आंकको।
सब दिन रूरो परै पूरो जहां-तहां ताहि, जाके है भरोसो हिए हनुमान हांकको॥12॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सेवक स्योकाई = सेवक की निष्ठा; जानकीस = जानकीपति श्रीराम; सूलपानि = भगवान शिव; सानुकूल = अनुकूल।
भावार्थ: हनुमान के सच्चे सेवक पर श्रीराम और भगवान शिव सहित दैवी शक्तियाँ अनुकूल होती हैं—ऐसा भक्तिभाव यहाँ व्यक्त होता है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: देवी देव दानव = देवी, देव और दानव; जोरैं हाथ = हाथ जोड़ते हैं; राजा रांक = राजा और निर्धन।
भावार्थ: हनुमानकृपा के सामने सांसारिक ऊँच-नीच का महत्व कम हो जाता है; राजा हो या रंक, सभी दैवी कृपा के आश्रित हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: जागत = जागते; सोवत = सोते; बैठे = बैठे हुए; बागत = चलते; अनर्थ = अनिष्ट; समर्थ = समर्थ रक्षक।
भावार्थ: जागते, सोते, चलते या आनंद में रहते हुए भी भक्त की रक्षा करने में हनुमान समर्थ हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: रूरो = शुभ; पूरो = पूर्ण; भरोसो = विश्वास; हिए = हृदय; हनुमान हांक = हनुमान की रक्षा-गर्जना।
भावार्थ: जिसके हृदय में हनुमान की रक्षा का विश्वास है, उसके जीवन में साहस और पूर्णता का भाव बना रहता है।
छंद 13 · घनाक्षरी
सानुग सगौरी सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोकको बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाई कहा काहू बीर आनकी।
केसरी-किसोर बंदीछोरके नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधानकी।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिए हुलसति हांक हनुमानकी॥13॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सगौरी = गौरी सहित; सूलपानि = भगवान शिव; लोकपाल = देव रक्षक; लखन = लक्ष्मण; राम = श्रीराम; जानकी = सीताजी।
भावार्थ: हनुमानकृपा पाने वाले भक्त के प्रति शिव-पार्वती, लोकपाल और श्रीराम परिवार अनुकूल रहते हैं—ऐसा काव्यभाव है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: लोक परलोक = यह लोक और परलोक; बिसोक = शोक से रहित; तिलोक = तीनों लोक; बीर आनकी = किसी अन्य वीर की आवश्यकता।
भावार्थ: जब ऐसा समर्थ रक्षक मिल गया, तो भक्त को किसी अन्य सहारे की आवश्यकता नहीं रहती।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: केसरी-किसोर = केसरीनंदन; बंदीछोर = बंधन छुड़ाने वाले; नेवाजे = कृपापात्र; कीरति बिमल = निर्मल यश; करुनानिधान = करुणा का भंडार।
भावार्थ: केसरीनंदन की कृपा पाने वाला भक्त धन्य है; हनुमान की करुणा और निर्मल यश सर्वत्र प्रसिद्ध है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बालक-ज्यों = बच्चे की तरह; पालिहैं = पालन करेंगे; मुनि सिद्ध = मुनि और सिद्ध; हिए = हृदय; हुलसति = आनंद से भरना।
भावार्थ: जिसके हृदय में हनुमान के नाम का उल्लास है, उसे दैवी कृपा बच्चे की तरह संभालती है—ऐसा भाव है।
छंद 14 · घनाक्षरी
करुना निधान, बल-बुद्धिके निधान, मोद-महिमा-निधान, गुन-ज्ञानके निधान हौ।
बामदेव-रूप, भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ।
आपने प्रभाव, सीतानाथके सुभाव-सील, लोक-बेद-बिधिके बिदुष हनुमान हौ।
मनकी, बचनकी, करमकी तिहूं प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ॥14॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: करुना निधान = करुणा का भंडार; बल-बुद्धि = शक्ति और बुद्धि; मोद-महिमा = आनंद और महिमा; गुन-ज्ञान = गुण और ज्ञान।
भावार्थ: हनुमान करुणा, बल, बुद्धि, आनंद, महिमा, सद्गुण और ज्ञान के अक्षय भंडार हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बामदेव-रूप = शिवस्वरूप; राम के सनेही = श्रीराम के प्रिय; अर्थ, धर्म, काम, निरबान = चार पुरुषार्थ।
भावार्थ: श्रीराम के प्रिय हनुमान का नाम जीवन के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में कल्याणकारी माना गया है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: आपने प्रभाव = अपना तेज; सीतानाथ = श्रीराम; सुभाव-सील = उत्तम स्वभाव; लोक-बेद-बिधि = लोक और वेद की विधि; बिदुष = विद्वान।
भावार्थ: हनुमान लोकव्यवहार और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों में पारंगत हैं और श्रीरामकृपा से दिव्य तेज धारण करते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: मनकी = मन से; बचनकी = वाणी से; करमकी = कर्म से; तिहूं प्रकार = तीनों प्रकार से; तुलसी तिहारो = तुलसी तुम्हारा है।
भावार्थ: तुलसीदास अपने मन, वचन और कर्म—तीनों को हनुमानजी को समर्पित करते हैं।
छंद 15 · घनाक्षरी
मनको अगम, तन सुगम किए कपीस, काज महाराजके समाज साज साजे हैं।
देव-बंदीछोर रनरोर केसरी-किसोर, जुग-जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसीकी ओर, सुनि सकुचाने साधु, खलगन गाजे हैं।
बिगरी संवार अंजनी-कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आए हनुमानके निवाजे हैं॥15॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: मनको अगम = मन से भी अकल्पनीय; तन सुगम किए = कर्म से संभव कर दिया; कपीस = कपिराज; महाराजके काज = श्रीराम का कार्य।
भावार्थ: जो काम असंभव लगते थे, हनुमान ने अपने पराक्रम से उन्हें सरल बना दिया और श्रीराम के कार्य के लिए सब व्यवस्था की।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: देव-बंदीछोर = बंधन छुड़ाने वाले; रनरोर = रण में गर्जना करने वाले; केसरी-किसोर = केसरीनंदन; जुग-जुग = युगों तक; बिरद = कीर्ति।
भावार्थ: केसरीनंदन की वीरता और रक्षक रूप की कीर्ति युगों से संसार में गाई जा रही है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बीर बरजोर = महाबली वीर; घटि जोर = बल घट जाना; तुलसीकी ओर = तुलसी की सहायता में; साधु = सज्जन; खलगन = दुष्ट।
भावार्थ: यदि तुलसी की रक्षा में हनुमान का बल मानो कम पड़ जाए, तो सज्जनों को दुःख और दुष्टों को आनंद होगा—कवि ऐसा भावपूर्ण तर्क रखते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बिगरी = बिगड़ी स्थिति; संवार = सुधारें; अंजनी-कुमार = अंजनीपुत्र; निवाजे = कृपापात्र।
भावार्थ: हे अंजनीकुमार! जैसे आपने अपने कृपापात्र भक्तों की बिगड़ी दशा सँवारी है, वैसे ही मेरी स्थिति भी सँवारें।
छंद 16 · सवैया
जान-सिरोमनि हौ हनुमान, सदा जनके मन बास तिहारो।
धरो बिगारो मैं काको कहा, केहि कारन खीझत हौ तो तिहारो।
साहेब-सेवक नाते ते हातो कियो, सो तहां तुलसीको न चारो।
दोष सुनाए तें आगेहुंको होसियार ह्वै हों, मन तौ हिया हारो॥16॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: जान-सिरोमनि = ज्ञानियों में श्रेष्ठ; जनके मन = भक्तों के हृदय में; बास = निवास; तिहारो = तुम्हारा।
भावार्थ: हे हनुमान! आप ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं और अपने भक्तों के हृदय में सदा निवास करते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: मैं काको = मैंने किसका; बिगारो = नुकसान किया; केहि कारन = किस कारण; खीझत = नाराज़ होते हो; तिहारो = तुम्हारा।
भावार्थ: तुलसी पूछते हैं—मैंने ऐसा क्या अपराध किया कि आप मुझसे नाराज़ हैं? मैं तो आपका ही हूँ।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: साहेब-सेवक नाते = स्वामी और सेवक का संबंध; हातो कियो = दूर कर दिया; न चारो = कोई उपाय नहीं।
भावार्थ: यदि स्वामी और सेवक का संबंध ही टूट जाए तो तुलसी के पास दूसरा कोई सहारा नहीं रह जाता।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: दोष सुनाए = दोष बता दें; आगेहुंको होसियार = आगे से सावधान रहूँगा; हिया हारो = हृदय थक गया।
भावार्थ: मेरे दोष बता दें ताकि मैं आगे उन्हें सुधार सकूँ; लगातार पीड़ा से मेरा मन अब बहुत थक चुका है।
छंद 17 · सवैया
तेरे थापे उठपै न महेस, थपै थिरको कपि जे उर घाले।
तेरे निवाजे गरीब-निवाज बिराजत बैरिनके उर साले।
संकट सोच सबै तुलसी लिए नाम फटै मकरेके-से जाले।
बूढ़ भए, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले॥17॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: तेरे थापे = जिसे तुमने स्थापित किया; उठपै न महेस = शिव भी उसे हिला न सकें; थिर = स्थिर; उर घाले = हृदय में धारण किए।
भावार्थ: जिसे हनुमान अपने संरक्षण में स्थिर कर दें, उसे कोई शक्ति आसानी से हिला नहीं सकती।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: निवाजे = कृपापात्र; गरीब-निवाज = दीनों के रक्षक; बैरिनके उर = शत्रुओं के हृदय में; साले = काँटे की तरह चुभते हैं।
भावार्थ: हनुमान की कृपा से भक्त ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है कि उसके विरोधी भी उससे विचलित होते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: संकट = कठिनाई; सोच = चिंता; लिए नाम = नाम लेने पर; मकरेके जाले = मकड़ी के जाले; फटै = टूट जाते हैं।
भावार्थ: हनुमान का नाम स्मरण करने से संकट और चिंताएँ मकड़ी के नाजुक जाले की तरह टूटने लगती हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बूढ़ भए = क्या वृद्ध हो गए?; मेरिहि बार = मेरी ही बारी में; हारि परे = थक गए; नत पाले = बहुत भक्तों को पालते-पालते।
भावार्थ: तुलसी प्रेमभरी शिकायत करते हैं—क्या मेरी बारी में ही आप वृद्ध हो गए या बहुत भक्तों को संभालते-संभालते थक गए?
छंद 18 · सवैया
सिंधु तरे, बरे बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे।
तैं रन-केहरि केहरिके बिदले अरि-कुंजर छैल छवासे।
तोसों समथ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवासे।
बानर बाज बाढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे॥18॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सिंधु तरे = समुद्र पार किया; बरे बीर = बड़े योद्धा; दले खल = दुष्टों को कुचला; जारे लंक = लंका जलाई।
भावार्थ: आपने समुद्र पार किया, महान दुष्ट योद्धाओं को हराया और लंका को अग्नि में जला दिया।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: रन-केहरि = रण का सिंह; अरि-कुंजर = शत्रुरूपी हाथी; केहरि = सिंह।
भावार्थ: युद्ध में आप सिंह समान हैं और शक्तिशाली शत्रु भी आपके सामने टिक नहीं पाते।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: तोसों समथ = आपके समान समर्थ; सुसाहेब = श्रेष्ठ स्वामी; दुख दोष = दुःख और दोष; दवा = दावानल।
भावार्थ: तुलसी सोचते हैं कि ऐसे समर्थ स्वामी की सेवा करते हुए भी वे दुःख की आग में क्यों जल रहे हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बानर बाज = वानरों में बाज समान; खल-खेचर = दुष्टरूपी पक्षी; लपेटि = झपटकर पकड़ लेना।
भावार्थ: हे महावीर! इन दुःखरूपी दुष्ट पक्षियों को एक ही झपट्टे में क्यों न समाप्त कर दें?
छंद 19 · सवैया
अच्छ-बिमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न से कुंजर केहरि-बारो।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो।
पापतें, सापतें, ताप तिहूंतें सदा तुलसी कह सो रखवारो॥19॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: अच्छ-बिमर्दन = अक्षयकुमार का संहार; कानन-भानि = वन का विनाश; दसानन = रावण; आनन = मुख; न निहारो = भय नहीं किया।
भावार्थ: अक्षयकुमार का संहार करने और अशोकवाटिका में पराक्रम दिखाने वाले हनुमान रावण के भयंकर क्रोध से भी नहीं डरे।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बारिदनाद = मेघनाद; अकंपन = अकंपन; कुंभकरन्न = कुंभकर्ण; कुंजर = हाथी; केहरि = सिंह।
भावार्थ: मेघनाद, अकंपन और कुंभकर्ण जैसे हाथी समान महायोद्धाओं के सामने हनुमान सिंह के समान वीर हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: राम-प्रताप = श्रीराम का तेज; हुतासन = अग्नि; बिपच्छ = शत्रुपक्ष; समीर = वायु; समीर-दुलारो = पवनपुत्र।
भावार्थ: हनुमान श्रीराम के प्रतापरूपी अग्नि को शत्रुपक्ष में और प्रचंड करने वाली वायु के समान हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: पापतें = पाप से; सापतें = शाप से; ताप तिहूंतें = तीनों प्रकार के ताप से; रखवारो = रक्षक।
भावार्थ: तुलसी हनुमान को पाप, शाप और तीनों प्रकार की पीड़ाओं से रक्षा करने वाले के रूप में पुकारते हैं।
छंद 20 · घनाक्षरी
जानत जहान हनुमानको निवाज्यौ जन, मन अनुमानि, बलि, बोल न बिसारिए।
सेवा-जोग तुलसी कबहूं कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारीए।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति, मोदक मरै जो, ताहि माहुर न मारिए।
साहसी समीरके दुलारे रघुबीरजूके, बांह पीर महाबीर बेगि ही निवारीए॥20॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: जानत जहान = पूरा संसार जानता है; निवाज्यौ जन = कृपापात्र सेवक; बोल न बिसारिए = अपना वचन न भूलें।
भावार्थ: संसार मुझे आपका कृपापात्र मानता है; इसलिए हे हनुमान, दिया हुआ आश्रय और वचन न भूलें।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: सेवा-जोग = सेवा योग्य; चूक = गलती; साहेब सुभाव = अच्छे स्वामी का स्वभाव; साहिबी संभारीए = अपना स्वामीपन निभाएँ।
भावार्थ: मैं उचित सेवक न रहा होऊँ और मुझसे भूल हुई हो, फिर भी अच्छे स्वामी की तरह मुझे संभालें।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: अपराधी = दोषी; सासति = दंड; सहस भांति = हजार प्रकार से; मोदक = मिठाई; माहुर = विष।
भावार्थ: यदि अपराध किया है तो दंड दें, लेकिन जो मिठाई से ही गिर पड़े उसे विष देकर न मारें—तुलसी अत्यंत विनम्रता से दया माँगते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: समीरके दुलारे = पवनदेव के प्रिय पुत्र; रघुबीरजूके = श्रीराम के; बांह पीर = बाँह की पीड़ा; बेगि = शीघ्र; निवारीए = दूर करें।
भावार्थ: हे महावीर पवनपुत्र! मेरी बाँह की यह पीड़ा अब शीघ्र दूर कर दें।
छंद 21 · घनाक्षरी
बालक बिलोकि, बलि, बारेतें आपनो कियो, दीनबंधु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारीए।
रावरो भरोसो तुलसीके, रावरोई बल, आस रावरीयै, दास रावरो बिचारीए।
बरो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलिको, निहारि सो निवारीए।
केसरी-किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बांहुपीर राहुमातु ज्यों पछारि मारिए॥21॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: बालक बिलोकि = बच्चा समझकर; बारेतें = बचपन से; आपनो कियो = अपना बनाया; दीनबंधु = दीनों के मित्र; निरुपाधि दया = निष्काम कृपा।
भावार्थ: तुलसी स्मरण करते हैं कि बचपन से ही हनुमान ने उन्हें अपना मानकर निष्काम कृपा की है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: रावरो भरोसो = आपका भरोसा; रावरोई बल = आपका ही बल; आस = आशा; दास रावरो = आपका सेवक।
भावार्थ: मेरी आशा, शक्ति और विश्वास सब आप में ही है; इसलिए मुझे अपना सेवक मानकर संभालिए।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बिकराल कलि = भयंकर कलियुग; काको न बिहाल = किसे व्याकुल नहीं किया; निवारीए = दूर करें।
भावार्थ: कलियुग का कठिन प्रभाव सबको पीड़ित करता है; हे हनुमान, मेरे ऊपर से उसकी पीड़ा दूर करें।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: केसरी-किसोर = केसरीनंदन; रनरोर = युद्ध में गर्जने वाले; बरजोर बीर = महाबली वीर; बांहुपीर = बाँह की पीड़ा; राहुमातु = सिंहिका।
भावार्थ: हे महाबली केसरीनंदन! जैसे आपने सिंहिका को परास्त किया था, वैसे ही मेरी बाँह की पीड़ा को भी पराजित करें।
छंद 22 · घनाक्षरी
उथपे थपनथिर थपे उठपनहार, केसरी-कुमार बल आपनो संभारीए।
राम के गुलामनिको कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरेको तकिया तिहारीए।
साहेब समर्थ तोसों तुलसीके माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिए।
पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरिकै बदन बिदारीए॥22॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: उथपे = गिरे हुए को उठाने वाले; थपनथिर = स्थिर करने वाले; उठपनहार = उखाड़ देने वाले; केसरी-कुमार = केसरीपुत्र; बल आपनो संभारीए = अपनी शक्ति याद करें।
भावार्थ: हे केसरीकुमार! आप गिरे हुए को उठाते हैं और अनुचित शक्ति को उखाड़ फेंकते हैं; अब मेरे लिए अपना बल प्रकट करें।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: राम के गुलामनिको = श्रीराम के सेवकों के लिए; कामतरु = कल्पवृक्ष; रामदूत = राम के दूत; दीन दूबरेको = दीन-दुर्बल के लिए; तकिया = सहारा।
भावार्थ: रामदूत हनुमान श्रीराम के सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और तुलसी जैसे निर्बल भक्त के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: साहेब समर्थ = शक्तिशाली स्वामी; माथे पर = रक्षा के रूप में सिर पर; अपराध बिनु = बिना अपराध; बांधि मारिए = बाँधकर मारना।
भावार्थ: ऐसे समर्थ स्वामी का संरक्षण रहते हुए मैं बिना अपराध के दंडित व्यक्ति जैसा क्यों पीड़ित हूँ?
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: पोखरी = तालाब; बिसाल बांहु = विशाल बाँह; बारिचर पीर = जलचर जैसी पीड़ा; मकरी = मगर; बदन बिदारीए = शरीर चीरकर नष्ट करें।
भावार्थ: तुलसी अपनी बाँह को तालाब और उसमें बैठी पीड़ा को मगर की तरह देखते हैं; हनुमान से उसे पकड़कर नष्ट करने की विनती करते हैं।
छंद 23 · घनाक्षरी
रामको सनेह, राम साहस लखन सिय, रामकी भगति, सोच संकट निवारीए।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंतको भरोसो तेरो भारीए।
कूदिए कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठिकै बिचारीए।
महाबीर बांकुरे बराकी बांहपीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लातघात ही मरोरि मारिए॥23॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: रामको सनेह = राम का प्रेम; साहस = साहस; लखन सिय = लक्ष्मण और सीता; भगति = भक्ति; सोच संकट = चिंता और संकट।
भावार्थ: श्रीराम के प्रेम, सीता-लक्ष्मण की कृपा और भक्ति के बल से मेरी चिंता और संकट दूर करें।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: मुद-मरकट = आनंदरूपी वानर; रोग-बारिनिधि = रोगरूपी समुद्र; जीव-जामवंत = जीवरूपी जामवंत; भरोसो = विश्वास।
भावार्थ: रोग के विशाल समुद्र को देखकर जीवन का आनंद कम हो गया है, पर भीतर का जामवंत अभी भी हनुमान पर भरोसा करता है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: कूदिए = छलाँग लगाइए; कृपाल = कृपालु; सुप्रेम-पब्बयतें = प्रेमरूपी पर्वत से; सुबेल = सुबेल पर्वत।
भावार्थ: हे कृपालु! तुलसी के प्रेमरूपी पर्वत से फिर एक बार पराक्रम की छलाँग लगाकर इस संकट का अंत करें।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: महाबीर = महावीर; बांहपीर = बाँह की पीड़ा; लंकिनी = लंकिनी; लातघात = लात का प्रहार; मरोरि मारिए = मरोड़कर नष्ट करें।
भावार्थ: जैसे आपने एक प्रहार में लंकिनी को गिराया था, वैसे ही इस बाँह की पीड़ा को भी समाप्त करें।
छंद 24 · घनाक्षरी
लोक-परलोकहूं तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूं निहारीए।
करम, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारीए।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव, दुखी देखियत भारीए।
बात तरुमूल बांहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारीए॥24॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: लोक-परलोक = यह लोक और परलोक; तिलोक = तीनों लोक; तोसे समरथ = तुम्हारे समान समर्थ; निहारीए = देखें।
भावार्थ: तीनों लोकों में देखने पर हनुमान जैसा समर्थ रक्षक दूसरा दिखाई नहीं देता—तुलसी का यह अटल विश्वास है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: करम = कर्म; काल = समय; लोकपाल = देव रक्षक; अग-जग = जड़ और चेतन जगत; जीवजाल = समस्त जीव; नाथ हाथ सब = सब स्वामी के हाथ में।
भावार्थ: कर्म, समय और सृष्टि की व्यापक व्यवस्था के बीच कवि हनुमान को अपनी महान शक्ति स्मरण करने के लिए कहते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: खास दास = विशेष सेवक; निवास तेरो = तुम्हारा निवास; तासु उर = उसके हृदय में; दुखी = पीड़ित।
भावार्थ: मैं आपका सेवक हूँ और आप मेरे हृदय में रहते हैं, फिर आपका यह सेवक इतना पीड़ित क्यों है?
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बात = वातदोष; तरुमूल = पेड़ की जड़; बांहुसूल = बाँह का शूल; बेलि = बेल; उखारीए = उखाड़ दें।
भावार्थ: बाँह की पीड़ा मानो वातदोष की जड़ से निकली विषैली बेल है; हे हनुमान, इसे खेल-खेल में उखाड़ दें।
छंद 25 · घनाक्षरी
करम-कराल-कंस भूमिपालके भरोसे, बकी बकभगिनी काहूतें कहा डरैगी।
बरी बिकराल बालघातिनी न जात कही, बांहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी।
आई है बनाई बेस, आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनीके पाले परैगी।
पूतना पिसाचिनी ज्यों कपिकान्ह तुलसीकी, बांहपीर महाबीर, तेरे मारे मरैगी॥25॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: करम-कराल-कंस = कठोर कर्मरूपी कंस; बकी बकभगिनी = बकासुर की बहन पूतना; काहूतें कहा डरैगी = किससे डरेगी?।
भावार्थ: तुलसी अपनी पीड़ा को ऐसी राक्षसी शक्ति की तरह देखते हैं जिसे कठोर कर्मरूपी कंस का सहारा मिला हो।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बिकराल = भयानक; बालघातिनी = बच्चों को मारने वाली; बांहुबल = भुजाओं का बल; बालक छबीले = सुंदर शक्तिशाली बालक।
भावार्थ: यह पीड़ा चाहे कितनी भी भयंकर हो, दैवी शक्ति के सामने उसका छल टिक नहीं सकता।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बनाई बेस = वेश बनाकर आई; बिचारि देख = विचार कर देखो; पाप जाय = पाप दूर हो; गुनीके पाले = समर्थ के हाथ में पड़ना।
भावार्थ: यह व्याधि छिपे रूप में आई हो, फिर भी हनुमान जैसे समर्थ रक्षक के सामने उसका वास्तविक रूप प्रकट हो जाएगा।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: पूतना पिसाचिनी ज्यों = पूतना जैसी राक्षसी; कपिकान्ह = कपिरूप कृष्ण की उपमा; बांहपीर = बाँह की पीड़ा; तेरे मारे मरैगी = आपके प्रहार से समाप्त होगी।
भावार्थ: जैसे श्रीकृष्ण ने पूतना का अंत किया, वैसे ही यह राक्षसी समान पीड़ा भी महावीर हनुमान के प्रहार से समाप्त हो—ऐसी प्रार्थना है।
छंद 26 · घनाक्षरी
भालकी कि कालकी कि रोषकी त्रिदोषकी है, बेदन बिषम पाप-ताप छलछांहकी।
करमन कूटकी कि जंत्र मंत्र बूटकी, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांहकी।
पैहहि सजाय नत कहत बजाय तोहि, बावरी न होहि बानि जानि कपिनांहकी।
आन हनुमानकी दोहाई बलवानकी, सपथ महाबीरकी जो रहै पीर बांहकी॥26॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: भालकी = भाग्य से; कालकी = समय से; रोषकी = क्रोध से; त्रिदोष = वात, पित्त और कफ; बेदन बिषम = गंभीर पीड़ा; पाप-ताप = पापजन्य कष्ट।
भावार्थ: यह पीड़ा भाग्य से है, समय से, किसी क्रोध से, शरीर के त्रिदोष से या कर्मफल से—तुलसी उसका कारण खोजते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: करमन कूट = दुष्कर्म; जंत्र मंत्र = यंत्र-मंत्र; बूट = जड़ी-बूटी; पराहि जाहि = भाग जा; पापिनी = पापरूपी शक्ति।
भावार्थ: कारण कुछ भी हो—कुयोग, मंत्र, औषध या कर्म—कवि इस पीड़ा को अब दूर जाने का आदेश देते हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: सजाय = दंड; बावरी = मूर्ख; कपिनांह = कपिनाथ; बानि = स्वभाव या शक्ति।
भावार्थ: तुलसी पीड़ा को चेताते हैं—हनुमान की शक्ति पहचान और मूर्खता मत कर, वरना अंत निश्चित है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: आन हनुमानकी = हनुमान की आन; दोहाई बलवानकी = महाबली की दुहाई; सपथ महाबीरकी = महावीर की शपथ; पीर बांहकी = बाँह की पीड़ा।
भावार्थ: हनुमान की आन लेकर तुलसी मानो पीड़ा को चुनौती देते हैं—अब यदि शक्ति है तो यहाँ टिककर दिखा।
छंद 27 · घनाक्षरी
सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है।
तोरि जमकातरि मंदोदरी करहोरि आनी, रावनकी रानी मेघनाद महतारी है।
भीर बांहपीरकी निपट राखी महाबीर, कौनके सकोच तुलसीके सोच भारी है॥27॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सिंहिका संहारि = सिंहिका का वध; सुरसा सुधारि छल = बुद्धि से सुरसा को पार किया; लंकिनी पछारि = लंकिनी को गिराया; बाटिका उजारी = वाटिका उजाड़ी।
भावार्थ: हनुमान ने सिंहिका को बल से, सुरसा को बुद्धि से और लंकिनी को प्रहार से जीता तथा अशोकवाटिका में अपना पराक्रम दिखाया।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: लंक परजारि = लंका जलाई; जातुधान = राक्षस; धूरिधानी = धूल में मिला दिया।
भावार्थ: उन्होंने लंका जला दी और राक्षसों की शक्ति को बार-बार धूल में मिला दिया।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: मंदोदरी = मंदोदरी; रावनकी रानी = रावण की रानी; मेघनाद महतारी = मेघनाद की माता।
भावार्थ: यह पंक्ति लंका के राजमहल तक फैले हनुमान के प्रभाव और भय का नाटकीय चित्र प्रस्तुत करती है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: भीर बांहपीरकी = बाँह की पीड़ा की सेना; निपट राखी = जस की तस रहने दी; कौनके सकोच = किस संकोच से; सोच भारी = भारी चिंता।
भावार्थ: इतने असंभव कार्य करने वाले महावीर मेरी बाँह की पीड़ा को क्यों रहने दे रहे हैं—यह विचार तुलसी को और दुखी करता है।
छंद 28 · घनाक्षरी
तेरो बालकेलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीरसुधि सक्र-रवि-राहुकी।
तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहुकी।
साम दाम भेद बिधि बेदहू लबेद सिद्धि, हाथ कपिनाथहीके चोटी चोर साहुकी।
आलस अनख परिहासकै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसीके बाहुकी॥28॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: बालकेलि = बाललीला; सहमत धीर = धीर लोग भी चकित; सक्र = इंद्र; रवि = सूर्य; राहु = राहु।
भावार्थ: हनुमान की बाललीलाएँ ऐसी अद्भुत हैं कि इंद्र, सूर्य और राहु जैसी दिव्य शक्तियाँ भी चकित हो जाती हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: तेरी बांह = तुम्हारी भुजा के आश्रय में; बिसोक = शोक रहित; लोकपाल = देव रक्षक; नाम लेत = नाम लेने पर; आरति = पीड़ा।
भावार्थ: जब देवता भी आपकी शरण में निर्भय हैं, तो आपके नाम का आश्रय लेने वाले भक्त की पीड़ा क्यों टिके?
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: साम = समझाना; दाम = दान; भेद = नीति; सिद्धि = सफलता; कपिनाथ = हनुमान।
भावार्थ: संसार की सभी नीतियाँ, उपाय और सिद्धियाँ हनुमान की सामर्थ्य के सामने छोटी दिखाई देती हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: आलस = विलंब; अनख = क्रोध; परिहास = मज़ाक; सिखावन = शिक्षा; एते दिन = इतने दिन; पीर = पीड़ा।
भावार्थ: मेरी पीड़ा इतने दिन क्यों रही? क्या यह विलंब है, नाराज़गी है, परिहास है या कोई शिक्षा?
छंद 29 · घनाक्षरी
टूकनिको घर-घर डोलत कंगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है।
कीन्ही है संभाल सार अंजनी-कुमार बीर, आपनो बिसारिहैं न मेरेहू भरोसो है।
इतनो परेखो सब भांति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है।
सासति सहत दास, कीजे पेखि परिहास, चीरेको मरन खेल बालकनिको सो है॥29॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: टूकनिको = टुकड़ों के लिए; घर-घर डोलत = घर-घर भटकता; कंगाल = निर्धन; बाल ज्यों = बच्चे की तरह; पालि पोसो = पाला-पोसा।
भावार्थ: तुलसी अपने गरीबी के दिनों को याद करते हैं, जब वे घर-घर भटकते थे और कृपालु प्रभु ने उन्हें बच्चे की तरह संभाला।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: संभाल = देखभाल; अंजनी-कुमार = अंजनीपुत्र; आपनो = अपना; बिसारिहैं न = नहीं भूलेंगे; भरोसो = विश्वास।
भावार्थ: हे अंजनीकुमार! आपने अब तक मुझे संभाला है, इसलिए मुझे भरोसा है कि अब भी अपने बनाए सेवक को नहीं भूलेंगे।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: सब भांति समरथ = हर प्रकार से समर्थ; कपिराज = कपिराज; सांची कहौं = सच कहूँ; तिलोक = तीनों लोक।
भावार्थ: आप हर प्रकार से समर्थ हैं; तीनों लोकों में आपके समान रक्षक और कौन है?
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: सासति सहत दास = दास दंड सह रहा है; पेखि परिहास = देखकर मानो हँसना; चीरेको मरन = छोटे जीव का मरना; खेल बालकनिको = बच्चों का खेल।
भावार्थ: आपका सेवक पीड़ा सह रहा है; उसकी दशा कहीं ऐसी न बन जाए कि उसका दुःख किसी को खेल जैसा लगे।
छंद 30 · घनाक्षरी
आपने ही पापतें त्रितापतें कि सापतें, बढ़ी है बांहबेदन कही न सही जाति है।
औषध अनेक जंत्र-मंत्र-टोटकादि किए, बादि भए देवता मनाए अधिकाति है।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म, काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है।
चेरो तेरो तुलसी, तू मेरो कह्यो रामदूत, ढील तेरी बीर मोहि पीरतें पिराति है॥30॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: आपने पापतें = अपने पाप से; त्रिताप = तीन प्रकार के ताप; सापतें = शाप से; बांहबेदन = बाँह की वेदना; सही न जाति = सहन नहीं होती।
भावार्थ: यह पीड़ा अपने कर्म से हो, तीनों तापों से या किसी शाप से—अब यह सहनशक्ति की सीमा पार कर चुकी है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: औषध अनेक = अनेक दवाएँ; जंत्र-मंत्र-टोटकादि = विविध उपाय; बादि भए = व्यर्थ हुए; देवता मनाए = देवताओं को प्रसन्न किया।
भावार्थ: अनेक उपचार और धार्मिक उपाय किए गए, फिर भी पीड़ा पूरी तरह दूर नहीं हुई।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: करतार = सृष्टिकर्ता; भरतार = पालनकर्ता; हरतार = संहारकर्ता; कर्म = कर्म; काल = समय; जगजाल = संसार का जाल।
भावार्थ: पूरा संसार सृष्टि, पालन, विनाश, कर्म और काल की व्यवस्था में चलता है; तुलसी इसके पीछे दैवी व्यवस्था स्वीकार करते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: चेरो तेरो तुलसी = तुलसी आपका सेवक है; रामदूत = राम के दूत; ढील तेरी = आपकी देरी; पीरतें पिराति = पीड़ा से भी अधिक पीड़ा देती है।
भावार्थ: आपने मुझे अपना कहा है; इसलिए आपकी सहायता में हो रही देरी मुझे शारीरिक पीड़ा से भी अधिक दुख देती है।
छंद 31 · घनाक्षरी
दूत रामरायको, सपूत पूत बायको, समथ हाथ पायको सहाय असहायको।
बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिकाके घायको।
एते बड़े साहेब समरथको निवाजो आजु, सीदत सुसेवक बचन मन कायको।
थोरी बांहपीरकी बरी गलानि तुलसीको, कौन पाप कोप, लोप प्रगट प्रभायको॥31॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: दूत रामरायको = श्रीराम के दूत; पूत बायको = वायुपुत्र; समथ हाथ पायको = हाथ-पैर से समर्थ; सहाय असहायको = असहाय के सहायक।
भावार्थ: आप श्रीराम के दूत, वायुपुत्र और निराधारों का सहारा बनने वाले महाशक्तिशाली वीर हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बिरदावली = यशगाथा; बेद गाइयत = वेद गाते हैं; रावन सो भट = रावण जैसा योद्धा; मुठिकाके घायको = मुक्के का प्रहार।
भावार्थ: आपका पराक्रम शास्त्रों में गाया जाता है और रावण जैसे महाबली ने भी आपकी शक्ति का अनुभव किया था।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: एते बड़े साहेब = इतने महान स्वामी; निवाजो = कृपापात्र; सीदत = क्षीण हो रहा; बचन मन काय = वाणी, मन और शरीर।
भावार्थ: फिर भी ऐसे समर्थ स्वामी का सेवक आज मन, वाणी और शरीर से दुर्बल होता जा रहा है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: थोरी बांहपीर = छोटी बाँह की पीड़ा; बरी गलानि = बड़ी लज्जा या दुःख; पाप कोप = किस पाप का क्रोध; प्रगट प्रभाय = प्रकट प्रभाव।
भावार्थ: इस छोटी-सी पीड़ा के सामने अपनी हालत देखकर तुलसी पूछते हैं—क्या किसी पाप के कारण आपकी कृपा का प्रभाव मुझ पर छिप गया है?
छंद 32 · घनाक्षरी
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, रामदूतकी रजाई माथे मानि लेत हैं।
घोर जंत्र मंत्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छारत निकेत हैं।
क्रोध कीजे कर्मको, प्रबोध कीजे तुलसीको, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं॥32॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: देवी देव = देवी-देवता; दनुज = दानव; मनुज = मनुष्य; मुनि = ऋषि; सिद्ध = सिद्धपुरुष; नाग = नाग; चेतन अचेत = चेतन और जड़।
भावार्थ: यहाँ पूरे जड़ और चेतन जगत का उल्लेख करके हनुमान की व्यापक महिमा का भाव प्रकट किया गया है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: पूतना पिसाची = पूतना जैसी पिशाचिनी; जातुधानी = राक्षसी; जातुधान = राक्षस; रामदूतकी रजाई = रामदूत की आज्ञा।
भावार्थ: भयानक और दुष्ट शक्तियाँ भी रामदूत हनुमान की आज्ञा स्वीकार करती हैं—ऐसा महिमाभाव है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: घोर = भयंकर; जंत्र मंत्र = यंत्र-मंत्र; कूट कपट = छल; कुरोग = गंभीर रोग; हनुमान आन = हनुमान की आन; निकेत = निवास।
भावार्थ: हनुमान की आन सुनकर भय, छल, अशुभ प्रभाव और रोग मानो अपना स्थान छोड़कर भाग जाते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: क्रोध कीजे कर्मको = दुखद कर्म पर प्रहार करें; प्रबोध कीजे = समझ और धैर्य दें; सोध कीजे = सुधारें; दोष दुख देत = दुःख देने वाले कारण।
भावार्थ: हे हनुमान! दुःख के कारणों को दूर करें, तुलसी को विवेक दें और जो दोष पीड़ा दे रहे हैं उनका समाधान करें।
छंद 33 · घनाक्षरी
तेरे बल बानर जिताए रन रावनसों, तेरे घाले जातुधान भए घर-घरके।
तेरे बल रामराज किए सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबरके।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हरके।
तुलसीके माथेपर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिए न दास दुखी तोसे कनिगरके॥33॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: तेरे बल = आपके बल से; बानर जिताए = वानर विजयी हुए; रन रावनसों = रावण के विरुद्ध युद्ध में; जातुधान = राक्षस।
भावार्थ: हनुमान के पराक्रम से वानरसेना को रावण के विरुद्ध विजय में महान शक्ति मिली।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: रामराज = श्रीराम का कार्य; सुरकाज = देवकार्य; सकल समाज साज = पूरी व्यवस्था; रघुबर = श्रीराम।
भावार्थ: हनुमान की सेवा और बल से श्रीराम का दिव्य कार्य पूर्ण होने में अत्यंत महत्वपूर्ण सहायता मिली।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: गुनगान = गुणगान; गीरबान = देवगण; पुलकत = रोमांचित; सजल बिलोचन = आँसुओं से भरे नेत्र; बिरंचि = ब्रह्मा; हरि हर = विष्णु और शिव।
भावार्थ: हनुमान की महिमा सुनकर देवता भावविभोर होते हैं और ब्रह्मा, विष्णु व शिव भी प्रेम से भर जाते हैं—ऐसी काव्यकल्पना है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: माथेपर हाथ फेरो = सिर पर कृपा का हाथ रखें; कीसनाथ = कपियों के नाथ; दास दुखी = दुखी सेवक; कनिगर = पारखी।
भावार्थ: हे कपिनाथ! तुलसी के सिर पर कृपा का हाथ रखें; आपके जैसा महान स्वामी अपने सेवक को दुःखी न रहने दे।
छंद 34 · घनाक्षरी
पालो तेरे टूकको परेहू चूक मूकिए न, कूर कौरी दूको हौं आपनी ओर हेरिए।
भोरानाथ भोरेही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अवधेरिए।
अंबु तू हौं अंबुचर, अंबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिए बिलंब अवलंब मेरे तेरिए।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसीकी बांह पर लामीलूम फेरिए॥34॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: पालो तेरे टूकको = आपकी कृपा के टुकड़ों पर पला; चूक = गलती; मूकिए न = छोड़ें नहीं; कौरी दूको = दो कौड़ी का; आपनी ओर हेरिए = अपना मानकर देखें।
भावार्थ: मैं आपकी कृपा से पला हूँ; मेरी भूल हुई हो तो भी मुझे त्यागिए मत। मैं कितना भी अयोग्य होऊँ, फिर भी आपका हूँ।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: सरोष = क्रोधित; थोरे दोष = छोटी गलती; पोषि तोषि = पाल-पोसकर; थापि आपनो = अपना बनाकर; अवधेरिए = तिरस्कार न करें।
भावार्थ: जिसे आपने स्वयं पालकर अपना बनाया है, उसे छोटी गलती के कारण दूर न करें।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: अंबु = जल; अंबुचर = जलचर; डिंभ = बच्चा; बिलंब = देर; अवलंब = सहारा।
भावार्थ: आपका और मेरा संबंध जल और जलचर जैसा है; इसलिए देर न करें—मेरा वास्तविक सहारा आप ही हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: बालक बिकल = व्याकुल बालक; प्रेम पहिचानि = प्रेम पहचानकर; पाहि = रक्षा करें; लामीलूम = लंबी पूँछ; बांह पर फेरिए = बाँह पर फेरें।
भावार्थ: मुझे व्याकुल बालक समझकर मेरा प्रेम पहचानें और मेरी पीड़ित बाँह पर अपनी कृपा का स्पर्श करें।
छंद 35 · घनाक्षरी
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यों, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है।
बरसत बारि पीर जारिए जवासे जस, रोष बिनु दोष, धूम-मूल मलीनाई है।
करुनानिधान हनुमान महाबलवान, हेरि हंसि हांकि फूंकि फौजैं तैं उड़ाई है।
खाए हुतो तुलसी कुरोग रार्ह राकसनि, केसरी-किसोर राखे बीर बरिआई है॥35॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: घेरि लियो = घेर लिया; रोगनि = रोगों ने; कुजोगनि = खराब परिस्थितियों ने; कुलोगनि = बुरे लोगों ने; जलद घन घटा = घने बादल।
भावार्थ: रोग और विपरीत परिस्थितियाँ तुलसी को ऐसे घेर लेती हैं जैसे घनघोर बादल दिन के आकाश को ढक लेते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बरसत बारि = वर्षा होती है; पीर जारिए = पीड़ा जलाती है; रोष बिनु दोष = बिना स्पष्ट अपराध के क्रोध; धूम-मूल = धुएँ की जड़।
भावार्थ: राहत मिलने के बजाय पीड़ा और बढ़ती है और कवि को लगता है कि बिना स्पष्ट दोष के दंड मिल रहा है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: करुनानिधान = करुणा का भंडार; महाबलवान = अत्यंत शक्तिशाली; हांकि = पुकारकर; फूंकि = फूँक मारकर; फौजैं = सेनाएँ; उड़ाई = उड़ा दीं।
भावार्थ: जिनकी एक हुंकार से सेनाएँ बिखर सकती हैं, उनके लिए इस रोगरूपी सेना को हटाना क्या कठिन है?
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: कुरोग = गंभीर रोग; राकसनि = राक्षसी; केसरी-किसोर = केसरीनंदन; राखे = बचाया; बरिआई = शक्ति से।
भावार्थ: भयानक रोग मुझे नष्ट कर देते, लेकिन केसरीनंदन की कृपा और शक्ति ने मुझे अब तक बचाए रखा है।
छंद 36 · सवैया
रामगुलाम तुही हनुमान गोसाईं, सुसाईं सदा अनुकूलो।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों, मंगल मोद समूलो।
बांहकी बेदन बांहपगार पुकारत, आरत आनंद भूलो।
श्री रघुबीर निवारीए पीर, रहौं दरबार परो लटि लूलो॥36॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: रामगुलाम = श्रीराम के सेवक; हनुमान गोसाईं = स्वामी हनुमान; सुसाईं = श्रेष्ठ स्वामी; सदा अनुकूलो = सदा कृपालु।
भावार्थ: हे हनुमान! आप श्रीराम के सच्चे सेवक और अपने भक्तों के लिए सदैव कल्याणकारी स्वामी हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बाल ज्यों = बच्चे की तरह; आखर दू = दो अक्षर; पितु मातु = माता-पिता; मंगल मोद = मंगल और आनंद।
भावार्थ: ‘रा-म’ के दो अक्षरों ने तुलसी को माता-पिता की तरह संभाला और जीवन में मंगल व आनंद दिया।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बांहकी बेदन = बाँह की वेदना; बांहपगार = बाँह का रक्षक; पुकारत = पुकारता हूँ; आरत = पीड़ित; आनंद भूलो = आनंद भूल गया।
भावार्थ: बाँह की पीड़ा से व्याकुल तुलसी अपने रक्षक को पुकारते हैं; दुःख ने उन्हें आनंद भी भुला दिया है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: रघुबीर = श्रीराम; निवारीए पीर = पीड़ा दूर करें; दरबार = प्रभु का आश्रय; लूलो = अशक्त।
भावार्थ: हे रघुवीर! मेरी पीड़ा दूर करें; शरीर कमजोर रहे तो भी जीवन आपके दरबार और चरणों के आश्रय में ही बीते।
छंद 37 · घनाक्षरी
कालकी करालता करम कठिनाई कीधौं, पापके प्रभावकी सुभाय बाय बावरे।
बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन, सोई बांह गही जो गही समीर डावरे।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिए मलीन भो तयो है तिहूं तावरे।
भूतनिकि आपनी परायेकै कृपानिधान, जानियत सबहीकी रीति राम रावरे॥37॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: कालकी करालता = समय की कठोरता; करम कठिनाई = कर्म की कठिनाई; पापके प्रभाव = पाप का प्रभाव; बाय = वातदोष; बावरे = उग्र।
भावार्थ: यह पीड़ा समय के प्रभाव से है, कर्म से, पाप से या शरीर के वातदोष से—तुलसी फिर उसके कारण पर विचार करते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: बेदन = वेदना; सही न जाति = सहन नहीं होती; राति दिन = रात-दिन; सोई बांह = वही बाँह; समीर = पवनपुत्र।
भावार्थ: यह पीड़ा रात-दिन असह्य है और वह उसी बाँह में बैठी है जिसे हनुमान के संरक्षण में माना गया है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: तरु तुलसी = तुलसी का पौधा; तिहारो = तुम्हारा; बारि सींचिए = जल से सींचें; मलीन = मुरझाया; तिहूं ताव = तीनों प्रकार के ताप।
भावार्थ: तुलसी स्वयं को प्रभु द्वारा लगाया गया पौधा मानते हैं और कहते हैं—आपका यह पौधा तीनों तापों से सूख रहा है, इसे कृपाजल दें।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: भूतनिकि = जीवों की; आपनी परायेकै = अपने और पराए की; कृपानिधान = करुणामय; जानियत = आप जानते हैं।
भावार्थ: हे कृपानिधान! अपना हो या पराया, हर जीव की दशा आप पूर्ण रूप से जानते हैं।
छंद 38 · घनाक्षरी
पांयपीर पेटपीर बांहपीर मुंहपीर, जरजर सकल सरीर पीरमई है।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहिपर दवरि दमानक सी दई है।
हौं तो बिन मोलके बिकानो बलि बारेही तें, ओट रामनामकी ललाट लिखि लई है।
कुंभज के किंकर बिकल बूरे गोखुरनि, हाय रामराय ऐसी हाल कहूं भई है॥38॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: पांयपीर = पैरों की पीड़ा; पेटपीर = पेट की पीड़ा; बांहपीर = बाँह की पीड़ा; मुंहपीर = मुँह की पीड़ा; जरजर = जर्जर; सकल सरीर = पूरा शरीर।
भावार्थ: पैर, पेट, बाँह और मुँह तक पीड़ा फैल गई है और पूरा शरीर मानो दुःख का रूप बन गया है।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: देव = देवता; भूत = अदृश्य शक्तियाँ; पितर = पितृ; करम = कर्म; खल = दुष्ट; काल = समय या मृत्यु; ग्रह = ग्रह; दमानक = तोप जैसा प्रहार।
भावार्थ: तुलसी अनुभव करते हैं कि अनेक दैवी, कर्मजन्य और प्रतिकूल शक्तियाँ मानो एक साथ उन पर टूट पड़ी हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: बिन मोलके बिकानो = बिना मूल्य पूरी तरह समर्पित; बारेही तें = बचपन से; ओट = आश्रय; रामनाम = राम का नाम; ललाट = माथा।
भावार्थ: तुलसी कहते हैं—मैं बचपन से राम को पूर्ण रूप से समर्पित हूँ और मेरे माथे पर मानो रामनाम का ही आश्रय लिखा है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: कुंभज = अगस्त्य मुनि; किंकर = सेवक; बिकल = व्याकुल; गोखुरनि = गाय के खुर में भरे जल जैसा छोटा स्थान।
भावार्थ: जो अगस्त्य जैसे समुद्र पीने वाले महापुरुषों की परंपरा का सेवक हो, वह गाय के खुर के पानी में डूबे—मेरी दशा भी ऐसी विचित्र क्यों हो गई, हे राम?
छंद 39 · घनाक्षरी
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुंहपीर-केतुजा कुरोग जातुधान है।
राम नाम जगजाप कियो चाहौं सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है।
सुमिरे सहाय राम-लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है।
तुलसी संभारी तारका-संहारि भारी भट, बेधे बरगदसे बनाई बानवान हैं॥39॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: बाहुक-सुबाहु = बाँह की पीड़ारूपी सुबाहु; लीचर-मरीच = चिपका रोगरूपी मारीच; मुंहपीर = मुँह की पीड़ा; कुरोग = गंभीर रोग; जातुधान = राक्षस।
भावार्थ: तुलसी अपने विभिन्न रोगों को रामायण के राक्षसों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: राम नाम = राम का नाम; जगजाप = महान जप; सानुराग = प्रेमपूर्वक; काल कैसे दूत = मृत्यु जैसे दूत; भूत = भयानक शक्तियाँ।
भावार्थ: मैं प्रेम से रामनाम जपना चाहता हूँ; फिर मृत्यु जैसी भयावह शक्तियों का मेरे ऊपर क्या अधिकार?
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: सुमिरे = स्मरण करने पर; सहाय = सहायक; राम-लखन = राम और लक्ष्मण; आखर दौऊ = दोनों नाम; जागत जहान = संसार में जीवित कीर्ति।
भावार्थ: राम और लक्ष्मण का स्मरण ही सहारा है और उनकी पराक्रमगाथा आज भी संसार में जीवित है।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: तारका-संहारि = ताड़का का वध करने वाले; भारी भट = महान योद्धा; बेधे = भेद दें; बरगदसे = बरगद समान विशाल; बानवान = बाणों से भर देना।
भावार्थ: तुलसी को विश्वास है कि ताड़का का वध करने वाले राम-लक्ष्मण उनके रोगरूपी राक्षसों को भी नष्ट कर सकते हैं।
छंद 40 · घनाक्षरी
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, रामनाम लेत मांगि खात टूकटाक हौं।
पर्यो लोकरीतिमें पुनीत प्रीति रामराय, मोहबस बैठो तोरि तरकितराक हौं।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी-कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं।
तुलसी गोसाईं भयो भोंडे दिन भूलि गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं॥40॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: बालपने = बचपन में; सूधे मन = सरल मन से; राम सनमुख = राम की ओर; मांगि खात = माँगकर खाना; टूकटाक = छोटे टुकड़े।
भावार्थ: बचपन में तुलसी का मन सरल था; वे रामनाम लेते हुए भिक्षा में मिले अन्न से जीवन चलाते थे।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: लोकरीति = संसार की रीति; पुनीत प्रीति = पवित्र प्रेम; मोहबस = मोह के वश; तोरि = तोड़कर।
भावार्थ: बाद में संसार के व्यवहार और मोह में पड़कर वह प्रारंभिक निर्मल भक्ति की सरलता कुछ कम हो गई।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: खोटे आचरन = गलत व्यवहार; अपनायो = फिर भी अपनाया; अंजनी-कुमार = अंजनीपुत्र; सोध्यो = सुधारा; रामपानि = राम के हाथ।
भावार्थ: गलतियों के बावजूद हनुमान ने तुलसी को नहीं छोड़ा, बल्कि सुधारकर उन्हें रामकृपा के योग्य बनाया।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: गोसाईं भयो = प्रतिष्ठित हुआ; भोंडे दिन = कठिन दिन; भूलि गयो = भूल गया; परिपाक = पका हुआ परिणाम।
भावार्थ: प्रतिष्ठा मिलने के बाद तुलसी पुराने कठिन दिनों को भूल गए और अब अपनी पीड़ा को उसी भूल का परिणाम मानते हैं।
छंद 41 · घनाक्षरी
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय-हाय को।
तुलसी अनाथसो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील-सिंधु आपने सुभायको।
नीच यही बीच पति पाइ भरुहाइगो, बिहाइ प्रभु-भजन बचन मन कायको।
तातें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको॥41॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: असन-बसन-हीन = भोजन और वस्त्र से रहित; बिषम-बिषाद-लीन = गहरे दुःख में; दीन दूबरो = निर्धन और दुर्बल; हाय-हाय = दया करना।
भावार्थ: एक समय तुलसी के पास भोजन और वस्त्र तक नहीं थे और उनकी दयनीय दशा देखकर लोग दया करते थे।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: अनाथ = निराश्रित; सनाथ = स्वामी वाला; रघुनाथ कियो = रघुनाथ ने अपना बनाया; सील-सिंधु = करुणा का समुद्र।
भावार्थ: उस निराश्रित तुलसी को रघुनाथ ने अपना बनाकर आश्रय और कृपा दी।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: पति पाइ = प्रतिष्ठा पाकर; भरुहाइगो = गर्व हो गया; बिहाइ = छोड़ दिया; प्रभु-भजन = भगवान का भजन; बचन मन काय = वाणी, मन और शरीर।
भावार्थ: प्रतिष्ठा मिलने पर गर्व आया और मन, वाणी तथा कर्म की पहले जैसी सरल भक्ति कम हो गई—तुलसी अपना दोष स्वीकारते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: तनु पेषियत = शरीर पीड़ित है; घोर बरतोर = गंभीर रोग; फूटि-फूटि = बार-बार फूटना; लोन रामरायको = राम का खाया हुआ नमक।
भावार्थ: तुलसी अपनी पीड़ा को राम की कृपा के प्रति अपनी जिम्मेदारी और पुराने ऋण का कठोर स्मरण मानते हैं।
छंद 42 · घनाक्षरी
जिऊं जग जानकी-जीवनको कहाइ जन, मरिबेको बारानसी बारि सुरसरिको।
तुलसीके दुहूं हाथ मोदक है ऐसे ठाऊं, जाके जिए मुए सोच करिहैं न लरिको।
मोको झूठो सांचो लोग रामको कहत सब, मेरे मन मान है न हरको न हरिको।
भारी पीर दुसह सरीरतें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करिको॥42॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: जिऊं = जीवूँ तो; जानकी-जीवन = सीताजी के प्रिय श्रीराम; जन = सेवक; मरिबेको = मृत्यु के लिए; बारानसी = वाराणसी; सुरसरि = गंगा।
भावार्थ: जीवन मिले तो राम के सेवक के रूप में जिएँ और मृत्यु आए तो काशी-गंगा की पवित्र स्मृति में—तुलसी दोनों को कल्याणकारी मानते हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: दुहूं हाथ मोदक = दोनों हाथों में लड्डू; ऐसे ठाऊं = ऐसी स्थिति; जिए मुए = जीवन या मृत्यु; सोच = चिंता।
भावार्थ: प्रभु के आश्रय में जीवन और मृत्यु दोनों मंगलमय हैं; इसलिए दोनों ही अवस्थाएँ दोनों हाथों में लड्डू जैसी हैं।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: झूठो सांचो = झूठा या सच्चा; लोग रामको कहत = लोग मुझे राम का कहते हैं; मन मान = मन की धारणा; हर = शिव; हरि = विष्णु।
भावार्थ: मैं योग्य हूँ या नहीं, संसार मुझे राम का भक्त मानता है और मेरा हृदय भी अपने इष्ट से अलग दूसरा आश्रय नहीं चाहता।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: भारी पीर = भारी पीड़ा; दुसह = असह्य; सरीरतें बिहाल = शरीर से व्याकुल; रघुबीर बिनु = रघुवीर के बिना; दूर करिको = कौन दूर करेगा?।
भावार्थ: इस असह्य शारीरिक पीड़ा को अंततः रघुवीर के अतिरिक्त कौन दूर कर सकता है?
छंद 43 · घनाक्षरी
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेसको महेस मानो गुरु कै।
मानस बचन काय सरन तिहारे पांय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुरकै।
ब्याधि भूतजनित उपाधि काहू खलकी, समाधि कीजे तुलसीको जानि जन फुरकै।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोगसिंधु क्यों न डारियत गाय खुरकै॥43॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: सीतापति = सीताजी के स्वामी श्रीराम; साहेब = स्वामी; सहाय हनुमान = सहायक हनुमान; महेस = महादेव; गुरु = मार्गदर्शक।
भावार्थ: तुलसी कहते हैं—मेरे स्वामी श्रीराम हैं, नित्य सहायक हनुमान हैं और हितकारी मार्गदर्शन के लिए महादेव मेरे गुरु हैं।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: मानस = मन; बचन = वाणी; काय = शरीर; सरन = शरण; पांय = चरण; भरोसे = विश्वास पर।
भावार्थ: मन, वाणी और शरीर से मैं आपके चरणों में शरणागत हूँ; आपके आश्रय के बाद मुझे दूसरा स्वतंत्र सहारा नहीं चाहिए।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: ब्याधि = रोग; भूतजनित = अदृश्य कारण से उत्पन्न; उपाधि = कष्ट; खलकी = किसी दुष्ट के कारण; समाधि कीजे = समाधान करें; जन = सेवक।
भावार्थ: इस पीड़ा का कारण रोग हो, कोई अज्ञात उपद्रव हो या प्रतिकूल परिस्थिति—तुलसी को अपना सेवक मानकर इसका समाधान करें।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: कपिनाथ = हनुमान; रघुनाथ = श्रीराम; भोलानाथ = शिव; भूतनाथ = महादेव; रोगसिंधु = रोग का समुद्र; गाय खुर = गाय के खुर का छोटा गड्ढा।
भावार्थ: हे कपिनाथ, रघुनाथ और भोलानाथ! इस विशाल रोगसागर को गाय के खुर में भरे जल जितना छोटा क्यों न कर दें?
छंद 44 · घनाक्षरी
कहौं हनुमानसों सुजान रामरायसों, कृपानिधान संकरसों सावधान सुनिए।
हरष बिषाद राग रोष गुन दोषमई, बिरची बिरंची सब देखियत दुनिए।
माया जीव कालके करमके सुभायके, करैया राम बेद कहैं सांची मन गुनिए।
तुम्हतें कहा न होय हाहा सो बुझाइए मोहिं, हौंहूं रहौं मौन ही बयो सो जानि लुनिए॥44॥
पंक्ति 1 – शब्दार्थ: कहौं = मैं कहता हूँ; हनुमानसों = हनुमान से; सुजान रामरायसों = ज्ञानी श्रीराम से; कृपानिधान संकरसों = कृपानिधान शंकर से; सावधान सुनिए = ध्यान से सुनिए।
भावार्थ: अंतिम छंद में तुलसी हनुमान, श्रीराम और भगवान शंकर से कहते हैं—मेरी अंतरात्मा की प्रार्थना ध्यान से सुनें।
पंक्ति 2 – शब्दार्थ: हरष = हर्ष; बिषाद = दुःख; राग = आसक्ति; रोष = क्रोध; गुन = गुण; दोष = दोष; बिरंची = ब्रह्मा; दुनिए = संसार।
भावार्थ: यह संसार सुख-दुःख, प्रेम-क्रोध, गुण-दोष और अनेक विरोधी अनुभवों से बना है।
पंक्ति 3 – शब्दार्थ: माया = माया; जीव = जीवात्मा; काल = समय; करम = कर्म; सुभाय = स्वभाव; करैया राम = अंतिम कर्ता राम; बेद कहैं = वेद कहते हैं।
भावार्थ: माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव की पूरी व्यवस्था के मूल में परमात्मा की इच्छा है—तुलसी इस सत्य पर मनन करने को कहते हैं।
पंक्ति 4 – शब्दार्थ: तुम्हतें कहा न होय = आपके लिए क्या असंभव है?; बुझाइए मोहिं = मुझे समझाएँ; रहौं मौन = मैं मौन रहूँ; बयो सो लुनिए = जो बोया है वही काटना होगा।
भावार्थ: तुलसी अंत में कहते हैं—आपके लिए क्या असंभव है, मुझे समझाएँ; अन्यथा मैं शांत रहकर स्वीकार करूँ कि जो कर्म बोए हैं उनका फल अब भोगना ही होगा।
हनुमान बाहुक का मुख्य भाव क्या है?
हनुमान बाहुक की शुरुआत श्री हनुमानजी के अद्भुत पराक्रम के वर्णन से होती है। समुद्र लाँघना, लंका दहन, राक्षसों को परास्त करना, श्रीराम की सेवा और शरणागत की रक्षा—इन प्रसंगों के माध्यम से तुलसीदास हनुमानजी की शक्ति और कृपा का स्मरण करते हैं।
रचना आगे बढ़ने पर उसका स्वर अधिक व्यक्तिगत हो जाता है। तुलसीदास अपनी शारीरिक पीड़ा, जीवन की कठिनाइयों और अपने कर्मों को लेकर हनुमानजी से मानो सीधा संवाद करते हैं। कहीं विनती है, कहीं प्रेमभरी शिकायत, कहीं आत्मपरीक्षण और अंत में पूर्ण समर्पण है।
इसी कारण हनुमान बाहुक केवल हनुमानजी की स्तुति नहीं है। यह एक भक्त की पीड़ा, विश्वास, प्रश्न, प्रार्थना और अंततः ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण की आध्यात्मिक यात्रा भी है।
हनुमान बाहुक में कौन-कौन से छंद हैं?
हनुमान बाहुक के कुल 44 छंद एक ही काव्य-छंद में नहीं लिखे गए हैं। इसमें छप्पय, झूलना, घनाक्षरी और सवैया जैसे छंदों का प्रयोग मिलता है। इसलिए ऊपर प्रत्येक छंद के क्रमांक के साथ उसका छंदनाम भी दिया गया है।
इस हिंदी हनुमान बाहुक अर्थ के बारे में
हनुमान बाहुक की मूल भाषा ब्रज है। यहाँ मूल पदों को आधुनिक हिंदी में बदलने के बजाय उनके मूल काव्यरूप को बनाए रखा गया है, जबकि समझने में सहायता के लिए शब्दार्थ और भावार्थ सरल हिंदी में दिए गए हैं।
कुछ ब्रज शब्दों और पुराने काव्य-प्रयोगों का सीधा एक-शब्दीय हिंदी अर्थ संभव नहीं है। ऐसे स्थानों पर अर्थ को शब्द-समूह या पूरे भाव के आधार पर समझाया गया है, ताकि पाठक मूल पंक्ति के साथ उसका भाव भी समझ सके।
॥ श्री हनुमते नमः ॥
